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Wednesday, 26 April 2017

jeevni..

जकड़े हुए जो हैं बेड़ियां मेरे इन क़दमों को
क्या इस दुनिया कि हैं बनाई
या फिर खलल हैं मेरे ही मस्तिष्क का
जो मैंने हस्ते हस्ते अपने क़दमों को हैं पहनाई
आज सुनाओ तुम्हे क्या कहानी
जी रही हूँ मैं अभी भी इस ज़िंदगी को
एक तोह लम्हा है जो गज़रता नहीं
और दर्द जो जाने कब भरेगा
अगर लिखने से मेरी इस व्यथा को
भर पायेगा किसी का कोई ज़ख्म
तोह सुन लो और सुना दो इस साड़ी दुनिया को
मेरे इस जीवन का यह कथन

shabd, akshar aur lavz

वोह रात न जाने क्यों इतनी थी अकेली
न जाने क्यों फिर भी था उसका कलेजा सुकून में डूबा
उजाले में खेले सवालों ने बुनी थी जो पहेली
उसका जवाब मिलना था, जैसे मिलना कोई अजूबा
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तुम कहते हो जानते हो मुझे
पहचान शब्द के हैं कई मतलब
समय से कुछ नहीं होता
कई बार सालों बीत जाते हैं अनजान रिश्ते में
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कहानियां कई हैं इस कलेजे में दबी हुई
बताना भले ही नहीं हो आसान
पर खुद को हूँ मैं सुनाती कई रातों को
क्यूंकि नहीं बनना चाहती मैं खुद से अनजान
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वक़्त किसी को लाता है करीब
किसी को बना देता है सबसे पराया
इस वक़्त के खेल से क्यों विचलित हो जाता है मन
इसने तोह न जाने कितनो को अनचाहा नृत्य है कराया
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