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Wednesday, 26 April 2017

jeevni..

जकड़े हुए जो हैं बेड़ियां मेरे इन क़दमों को
क्या इस दुनिया कि हैं बनाई
या फिर खलल हैं मेरे ही मस्तिष्क का
जो मैंने हस्ते हस्ते अपने क़दमों को हैं पहनाई
आज सुनाओ तुम्हे क्या कहानी
जी रही हूँ मैं अभी भी इस ज़िंदगी को
एक तोह लम्हा है जो गज़रता नहीं
और दर्द जो जाने कब भरेगा
अगर लिखने से मेरी इस व्यथा को
भर पायेगा किसी का कोई ज़ख्म
तोह सुन लो और सुना दो इस साड़ी दुनिया को
मेरे इस जीवन का यह कथन

shabd, akshar aur lavz

वोह रात न जाने क्यों इतनी थी अकेली
न जाने क्यों फिर भी था उसका कलेजा सुकून में डूबा
उजाले में खेले सवालों ने बुनी थी जो पहेली
उसका जवाब मिलना था, जैसे मिलना कोई अजूबा
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तुम कहते हो जानते हो मुझे
पहचान शब्द के हैं कई मतलब
समय से कुछ नहीं होता
कई बार सालों बीत जाते हैं अनजान रिश्ते में
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कहानियां कई हैं इस कलेजे में दबी हुई
बताना भले ही नहीं हो आसान
पर खुद को हूँ मैं सुनाती कई रातों को
क्यूंकि नहीं बनना चाहती मैं खुद से अनजान
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वक़्त किसी को लाता है करीब
किसी को बना देता है सबसे पराया
इस वक़्त के खेल से क्यों विचलित हो जाता है मन
इसने तोह न जाने कितनो को अनचाहा नृत्य है कराया
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Friday, 16 January 2015

आज फिरसे

आखें बंद करी
चेहरा मुरझाया है
आज क्या फिरसे
छाया गम का साया है

सब कहतें हैं नहीं है मेरे पास
कोई वजह गुमसुम रहने की
मेरा है जो हाल कभी
कौन समझ पाया है

हवा जो चलती है
लहराते हैं पत्ते कई
इस हवा के रुख के साथ
क्या बदला अपना परया है

मामूली लगते हैं मुझे
यह दुनिया के कीमती गुम्बद
इस शीशे सामान पिंजर मैं को
न जाने कितनो ने रुलाया है

न चाहिए मुझे कोई हाथ
जो रोक सके इस बिखरी हुई सोच को
मेरे इस बहते हुए व्यक्तित्व को
मेरे ही बनाये तिनके का सहारा है

खुशियां हैं मुझसे
और मैंने ही संभाले हैं अपने गम
इस रेत के सामान किनारे मन में
कौन सी लहर का व्यक्तित्व समा पाया है.

- Diary of an Oxymoron

Friday, 12 December 2014

गुम्बद

एक पत्थरों का गुम्बद है
और पंछियों का सुर है गूँज रहा
एक कहानी है जो लिखी नहीं गई
और एक सुनाने को मन मचल रहा

रंगीन इस शहर में
क्यों सफ़ेद और काला है यह पल
रूकते हुए जैसे कोई ग़ज़ल
आज शुरू होने को है

एक तो पत्थरों के हैं यह लोग अनेक
और बंजर इनका मन है बन गया
एक कविता है जो नहीं बनी
और एक अधूरा ख़्वाब है करवट बदल रहा

एक रौशनी की किरण
और अँधेरी कोठरी
एक खुला आसमान
और एक बंद दरवाज़ा

- Diary of an Oxymoron 


Saturday, 30 August 2014

कल्पना

धूप हूँ कभी, और कभी हूँ मैं छांव 
कभी किसी की मुसकुराहट, कभी नम नयन
कहीं बहती नदी, कहीं थमता गाँव 
जो भी कहो, हूँ तुम्हारी ही
कल्पना का अंश
- Diary of an Oxymoron



Sunday, 24 August 2014

भाव

शोर में सन्नाटा
कभी सुना है?
क्या कभी देखा है?
अँधेरे में उजाला
या फिर महसूस किया है कभी?
दर्द में ख़ुशी का एहसास

जिस दिन यह सब मिल जायेगा एक साथ
उस दिन सुन्न हो जायेंगे सारे भाव
सारे के सारे
भाव

- Diary of an Oxymoron



हौंसला ही काफी है

पंख भले ही न हों मेरे दामन में 
पर उड़ना सीख लिया है 
कौन कहता है ज़रूरी है की कोई हवा चले 
उड़ान भरने के लिए हौंसला ही काफी है

- Diary of an Oxymoron 


Monday, 18 August 2014

रंगीन शहर

रंगीन शहर है दिखता मुझे सफ़ेद 
और काले रंग में दिखते हैं गुलाबी रंग अनेक 

खून का नहीं, प्यार का लाल 
मज़जिद का नहीं, खेतों का हरा 
मंदिरों का पीला नहीं, सरसों का रंग
डर और शोर नहीं, खुशियों के संग

- Diary of an Oxymoron

नखलिस्तान

चिलमन नहीं यह है एक नखलिस्तान 
जहाँ सीधा क्या और उल्टा क्या है 
देखने का नज़रिया जो बदला 
नज़रों की दिशा ही बदल गई 

सोचती हूँ, नई दृष्टि है, या फिर नई कहानी
की सोच ही बदल गई है

- Diary of an Oxymoron 



मटक लटक

क्योंकि जीना मैंने सीख लिया है 
भले ही दामन में हों गम हज़ार
मटक लटक कर कर लेंगे हम 
जीवन के यह पल गुज़ार

भले पढ़ी नहीं हूँ मैं
न मैंने शहर है देखा कोई
पर खुशियों से युंह भरा है मेरा आँचल
की हस्ते हस्ते मैं हूँ रोइ

चलते है रहना,
हैना बहना?

- Diary of an Oxymoron 




Warps & Wefts: ताना बाने

इस जीवन के करघे से
हमने हर एक पहलु को है सुना
कभी हसी का ताना और कभी गम के बाने को
अपने हाथों से है बुना

उस खादी के जैसा है हर एक क्षण
जिसमें इन्द्रधनुष के सभी भर दिए हैं हमने रंग

चलती चलती यह इंसानी मशीन
किसी दिन यूंह ही रुक जाएगी
फिर नया चक्र चलेगा,
नई कहानी बुनने में आएगी

- Diary of an Oxymoron



Monday, 21 July 2014

बिखरे हुए लव्ज़

पंख भले ही न हों मेरे दामन में
पर उड़ना सीख लिया है
कौन कहता है ज़रूरी है की कोई हवा चले
उड़ान भरने के लिए हौंसला ही काफी है

नसीब की बातें न करिये आज
ऐसा न हो की खुद पे से विश्वास ही उठ जाये
हाथों की लकीरों का क्या कुसूर
हिम्मत तोह बिना हाथ वालों में भी बहुत है

एक ज़ालिम समाज है
जिसको कोसते कोसते हम थकते नहीं
और एक यह ज़ालिम दिल है हमारा
की सवालों के जवाब में खुद को चोट पहुचता है

कुछ लकज़ आज फिर हैं बिखरे हुए
जैसे वक़्त ने सवालों का डिब्बा है खोला
दर्द है की सिमट नहीं रहा
और कमभक्त ढक्कन ही गायब हो गया है

रुकते नहीं हैं जो समय के यह पल
वैसे ही थम नहीं पा रही है मेरी उलझन
कुछ तोह मेरा कुसूर ज़रूर होगा
वरना ऐसा ज़ुल्म? हाय तौबा

रौशनी जो आज दिख रही है
वह है किसी बादल के गरजने की चमक
अपने आप को समेटे रखना है
एक दिन तोह उजाला भी चेहरा दिखायेगा

- Diary of an Oxymoron

Friday, 4 July 2014

मद्धम मद्धम

वो हवाएं जब चुपके से मेरी ज़ुल्फ़ों में चली आयी
ऐसा लगा कि तुमने कुछ कहा है
फिर तोह एक आहात भी सन्नाटे में शोर लगने लगी
खो जाने में कि खुश थी मैं

कभी तेज़ और कभी नरम
वोह हवा थी कभी ठंडी और कभी थोड़ी गरम
पर हर एक झोंके ने दिलाया यह एहसास
कि न चाहते हुए भी, शायद तुम हो पास

सोचा था एक दिन सच कहूँगी मैंने भी
की क्या होगा जब एहसास हो जायेगा नम
उस दिन जब हवा नहीं करेगी मुझे स्पर्श
क्या दुनिया मेरी जायेगी थम?

मद्धम मद्धम तुम चलो, शांत रहूँ मैं भी
उस समय के गीले एहसास में
क्या दोनों खो जायेंगे?
या खोने में पा लेंगे एक दुसरे को हम?

यह जो शब्द हैं अटके हुए
या भावनाएं हैं दबी कहीं
उस हवा के एक झोंके से
क्या सब बेह जायेगा, या जायेगा थम?

- Diary of an Oxymoron 

Thursday, 1 May 2014

कोई आरज़ू

कोई आरज़ू हो जैसे यूंह दबी हुई
कोई डर का बादल जैसे हो मंडरा रहा
क्या जानूं मैं कि क्यूँ ये करे है चंचल मेरा मन
असमंजसों के इस सागर में भटका यह कहाँ जा रहा

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वोह था एक टेड़ा मेढ़ा आइना जो था मिला
जिसमें नहीं थी सही छवि अपनी दिखी
गम तोह इस बात का है आज भी
कि उसे ही हम जीवन की सचाई समझ बैठे

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सन्नाटा या शोर, परछाइयाँ या विभोर
चाहिए तुझे क्या ए बावरे मन
आहट जो होती है हर एक बार
इच्छाएं रंग बदल देती हैं, तमन्नाएं बदल देती हैं पुकार

- Diary of an Oxymoron

Wednesday, 26 March 2014

अटकी हुई

मैं हूँ नहीं परेशां आज फिर भी
न जाने किस बात कि बैचैनी है उलझा रही
जो वक़्त चला गया वोह दिखाई है दे रहा
जो जी रही हूँ वोह न जाने क्यूँ नहीं लगता सही

आगे जो होना है उसका किसको है पता
इस बात में नहीं हूँ मैं आज डूबी हुई
फिर भी न जाने क्या बात है उलझाये हुए
कि अटकी हुई है मेरे समय कि हर एक सुई

वक़्त भले ही है दौड़ रहा
थमी हुई हैं मेरी हर सांस आज
कैसे सुलझाऊँ मैं हर एक अपनी उधेड़बुन
इस असमंजस का कब मिलेगा कोई इलाज

जान नहीं, पहचान नहीं, फिर भी अटकी हुई हूँ मैं कहीं

- Diary of an Oxymoron 

Wednesday, 19 March 2014

शब्द - निशब्द

यह कविता मेरी
नहीं कोई ज़रिया मुझे जान्ने का
यह तोह बस एक दूर का मृगजल है
पास आओगे, तोह छुह हो जायेगा!
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अदृश्य दीवारें जो दिखाई देती हैं
कल्पना कि उपज हैं तुम्हारी
मेरे इस टेढ़े मेढ़े दर्पण में न देखो
खुद को अनजान समझने लगोगे

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लहरें आती हैं, लहरें जाती हैं
किनारा वहीँ का वहीँ रेह जाता है
लहरें तोह शायद किनारे का फिर भी सोच लें
किनारे को कभी किसी एक लहर पे रोते देखा है?
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चाहे कहो उसे धुप या सूरज निराला
है वोह बारिश के तीर, पानी कि बहती ज्वाला
कभी रेगित्सान कि मिटटी और कभी बंजर यह ज़मीन
कभी मीठी सी खुश्बू, कभी बेरंग नमकीन

उड़ती चिड़िया, जुडी हुई जड़ें
अनसुना संगीत, शान्ति कहीं है खड़े
आग या हवा, अनजान एक कहानी
कैसे शुरू करोगे सुनानी?
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जो लम्हे अभी जीए नहीं
उनको सोच के क्यूँ ए दिल तू है परेशान
जिनमें सांस ले रहा है ए राही
उसमें क्यूँ नहीं छोड़ देता अपने कुछ निशान


Saturday, 15 March 2014

कुछ भी …..

बेचैन होना भी एक नशा है
कभी चख के देखो तोह ज़रा
चैन मिलता है जब कुछ पल के लिए
जान निकल जाती है!

कुछ भी ---------------

कहानियां कई हैं
इस बंजर ज़मीन में हुई दबी
खोदने कि हिम्मत चाहिए
खज़ाना मिलना फिर दूर कहाँ

कुछ भी ---------------

कहानियोंकी जुबां की
होती नहीं कोई भाषा 
सुनो तोह उन्हें ध्यान से
डूबने के लिए क्या ज़रुरत किसी शब्द कि 

कुछ भी ---------------

आज सुनी जो है कहानी 
तुमने मेरी मूक ज़ुबानी 
काम न भले आये अभी 
सोच में दाल देगी आगे कभी 

कुछ भी ---------------

कहीं दूर जब 
किसी रानी की
कोई सुनान रात।

क्या ऐसे शुरू हुई थी कोई तुम्हारी बात?

Wednesday, 12 March 2014

परचाहियां

परचाहियां जैसे हैं साथ नहीं छोड़ती
शायद ऐसे ही हैं कुछ अजीब पल चल रहे मेरे साथ
घनघोर कर देते हैं जब आते हैं दिन में याद
और सूनी कर देते हैं हर अँधेरी रात

कभी सोचती हूँ कि क्या रौशनी में भी
होता है ऐसा अजीब सा सूनापन
कि हर बात लगने लगती है अजीब
और हर शब्द कर देता है विचलित यह मन

अँधेरा उजाला, सब हो जाये जब एक सामान
तब सुन्न हो जाते हैं एहसास
क्या तब लालसा होती है बदलाव की?
क्या होती है शोर कि प्यास?

क्या चाहिए तुझे?
बता भी दे मुझे आज
इस उधेड़बुन का ओः अन्वेषक
है क्या सही इलाज?

- Diary of an Oxymoron 

Sunday, 9 March 2014

दुआ भी मैं, दवा भी मैं

ज़ख्म को खुला रहने दो
दवाई कैसे रास्ता ढूंढ पायेगी
ज़ख्म भरेगा या बढ़ेगा
पता चलेगा, दवा कितनी रास आएगी

वोह दवा भी क्या दवा जो दर्द न दे
कड़वाहट में भी भरने का मज़ा है
जल्दी अगर त्याग दिया उसे
समझोगे वोह किसी कर्म कि सज़ा है

पर मलहम भी जब रास न आये
कोई दुआ जब काम न दे
ज़ख्म को वक़्त की देदो पनाह
देखो कैसे समय आराम न दे

दुआ भी मैं, दवा भी मैं,
समय का खेल है यह निराला
जिस मलहम की चाह में हम सारा जग निकले
उसे ही ज़ख्म यह जीवन का दे डाला

- Diary of an Oxymoron 

Friday, 7 March 2014

अक्षरों में जो न समां पाये

एक बादल कुछ अजीब सा
सर के ऊपर है छाया
न जाने कैसे वोह बना इतना विशाल
न जाने कैसे खंघोर हुआ उसका साया

कुछ लव्ज़ अटके हुए हैं मेरे इस संगीत में
नहीं करने देते कथन को पूरा
क्या रुक जाऊं जब तक नहीं मिल जाता सही अंत?
या फिर छोड़ दूं इस असमंजस को अधूरा?

लिखते लिखते हूँ रुक जाती
चलते चलते थम जाती हूँ मैं कहीं
आधी कहानी जब लाये आक्रोश कि ज्वाला
कहीं खो जाती हूँ एक दम से वहीँ

कभी आंसू साथ नहीं देते
और कभी हसी ही नहीं है रूकती
जब चेहरे पे हो ख़ुशी सुहानी दिखती
दिल की हर नस है कहीं न कहीं दुखती

अक्षरों में जो न समां पाये
वोह एहसास हर वक़्त है याद रहता
थम जाए कहीं ये वोह कहानी कहाँ
क्युंकि हर मनोभाव यहाँ है दरिया कि तरह बहता

कौन रोक पायेगा, इस मूक तूफ़ान को?

-Diary of an Oxymoron